नए ज़माने के वैध - Success Businessman Story in Hindi | HindiApni
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नए ज़माने के वैध – Success Businessman Story in Hindi

Success Businessman Story in Hindi

Motivational Story in Hindi for Success

आयुर्वेदिक क्षेत्र के उधमी आनंद मोहन छापरवाल हार्ट अटैक से पीड़ित एक अपनी दोस्त की दास्तान सुन रहे थे। उनके दोस्त लम्बे समय से चले आ रहे इलाज और आस्पताल के महंगे बिल से परेशान थे। यह सुनकर आनंद मोहन छापरवाल के दिमाग में आया की सदियों से चले आ रहे आयुर्वेद के पास इसका इलाज क्यों नहीं हैं। इसके बाद छापरवाल ने प्राचीन ग्रंथो का अध्यन करना शुरू किया। और पुराने वैधो से बात की कुछ शिक्षित अयुर्वेद्क चिकित्सक से बात की और उन्होंने लैबोरेटरी में खुद वैज्ञानिक और वैधो की सेवाए लेकर कई साल तक रिसर्च करवाई। इस का नतीजे की रूप में दो प्रोडक्ट उनके हाथ लगे। हार्ट अटैक की आशंका ख़त्म करने वाली औषधि ह्रदय कवच और साइलेंट किलर डायबिटीज का दुश्मन डायबेगन दोनों दवाओ ने चमत्कारी परिणाम दिए। छापरवाल कहते हैं की इन रोगों का प्रकीर्तिक इलाज पूरी तरह होता हैं।

ये दो प्रोडक्ट सामने लाने वाले दीनदयाल औषधि के मैनेजिंग डायरेक्टर छापरवाल कहते हैं। आज रिसर्च के बूते आयुर्वेद में बीमारियों के साथ शारीरिक समस्याओ के प्राकृतिक ढंग से उपचार में मदद मिली हैं। छापरवाल बताते हैं की प्रचीन काल में ब्लडप्रेशर के लिए रुद्राक्ष धारण करने की सलाह दी जाती थी। बताते हैं की इससे हृदय की धड़कन नियंत्रण में रहती हैं। इसी धारणा पर प्रयोग कर के ह्रदय कवच औषधि तैयार की गई हैं। इसी प्रकार डायबिटीज के लिए जामुन का सिरका इस्तेमाल कर के डायबेगन तैयार की गई हैं।

छापरवाल बाताते हैं की उन्होंने पीढ़ी की जरुरत को ध्यान में रखकर अपनी दवाई तैयार की हैं। आयर्वेद का नियम है की बीमार पड़ने से संकेत मिल जाये तो उसका उपचार ठीक ढंग से किया जाए। खासतौर पर नई पीढ़ी के लिए हेल्थ के समाधान दिए जाने चाहिए। इस लिए पारम्परिक चूरन – चटनी की जगह कैप्सूल और टेबलेट फॉर्म में औषधियां उपलब्ध कराई गई हैं।

छापरवाल का कहना हैं की कुछ अरसा पहले आयर्वेद इलाज पद्धति एलोपैथी के मुकाबले काफी पिछड़ गई थी। कारण यह था की लोग आयुर्वेद प्रोडक्ट को चूरन – चटनी समझते थे। और इलाज को निम् हाकिम वाला। छापरवाल बाताते हैं की हमने प्रोडक्ट को आकर्षित बानाने पर जोर दिया। अब चूरन – चटनी की जगह आयुर्वेद सिरप, कैप्शुल, टेबलेट, और ग्रैन्यूल्स के फॉर्म में उतारे हैं।

छापरवाल डॉक्टर और आस्पताल के बारे में बने माहौल की ओर इशारा करते हुए कहते हैं। पहले लोग पुलिश और वकील के पास जाने से डरते थे। लेकिन आज हॉस्पिटल और इलाज के नाम से डर जाते हैं। इसका सीधा सा कारण हैं की इलाज में खर्च और उससे जुड़ी समस्या काफी हैं। ऐसे में आयुर्वेद ने सभी का ध्यान अपनी और खीचा हैं। आज इनकी कम्पनी 600 से ज्यादा प्रकार के प्रोडक्ट बनाती हैं। लाइफ स्टाइल ने जो बीमारियों को नई पीढ़ी में पैदा की हैं उनका निदान भी आयुर्वेद ने दिया हैं।

दीनदयाल औषधि को आधुनिक कम्पनी का रूप देने वाले छापरवाल के परिवार में दरअसल कई पीढियों से आयुर्वेद पर काम हो रहा हैं। कम्पनी की योजना अब हर मेट्रो सिटी और इंटरनेशनल मार्किट में अपने आयुर्वेद के प्रोडक्ट को पहुचाने की हैं। इसके साथ ही छापरवाल ने ग्वालियर की जीवाजी यूनिवर्सिटी के साथ एक आयुर्वेदिक कालेज बनाने का भी समझोता किया हैं। इस कॉलेज में बीएएमएस की डिग्री के साथ आयुर्वेदिक पर रिसर्च होगा। इसके आलवा ग्वालियर में एक आयुर्वेदिक रिसॉर्ट बनाने का भी प्लानिग हैं।

छापरवाल को इस क्षेत्र में संम्भावना के अलवा चुनौतियां भी दिख रही हैं। बदले परिवेश में एलोपैथी की तुलना में आयुर्वेद का मार्केट नया हैं। अब कई मल्टीनेशनल कम्पनिया इस फिल्ड में आने को तैयार हैं। 1927 में स्थापित एक छोटी सी कम्पनी जो आयुर्वेदिक चूरन और चटनी बनाने वाली कम्पनी थी। आज इसमें 250 से जयादा लोग काम करते हैं। कम्पनी का कारोबार आज 50 करोड़ तक पहुच गया हैं। अगले साल तक इस कम्पनी का कारोबार 100 करोड़ तक पहुचने की उमीद हैं।

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