हरित क्रांति में उपजा अखुआ - Successful Entrepreneurs In India | HindiApni
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हरित क्रांति में उपजा अखुआ – Successful Entrepreneurs In India

Successful Entrepreneurs Stories in Hindi

Success Stories of Indian Entrepreneurs in Hindi

आर जी अग्रवाल ने समय और मौका कभी भी बेकार नहीं गंवाया उनका दिन दूना बढ़ता कारोबार इसी का गवाही देता हैं। 50 वर्ष का तजुर्बा रखने वाले अग्रवाल के परिवार 150 वर्ष पहले राजस्थान के शेखावाटी से निकलकर दिल्ली और मुंबई में बस गए।

आर जी अग्रवाल एक फैक्ट्री लगाना चाहते थे। पढाई करने की बाद अग्रवाल ने मन बना लिया था की मैं पुश्तैनी धंधा नहीं करूंगा। उन दिनों हरित क्रांति चर्चा में थी। और सबसे नई चीज थी की लोग अमेरिका से आये गेंहू के लिए लाइन में लगते थे। फिर भी नहीं मिलने पर ब्लैक से खरीदते थे। पैदवार बढ़ाने के बात चल रही थी। अग्रवाल के पिता ने समझाया की जिस कारोबार में जाना हो उसमे पहले ट्रेडिंग का काम शुरु करे। अग्रवाल ने 25,000 रूपये की पूंजी से पहले खाद और फिर पेस्टीसाईंडस की ट्रेडिंग शुरु कर दी। उस समय भारतीय खाध निगम और भारतीय उर्वरक निगम ही खाद आयत करते थे। इसी बीच गेंहू की ज्यादा पैदवार करने वाली किस्म भारत आई। इस हरित क्रांति का सबसे ज्यादा असर पंजाब, पश्चिम उतर प्रदेश, राजस्थान के कुछ इलाको और हरियाणा में था।

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फेक्ट्री लगाने की इच्छा रखने वाले अग्रवाल के सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी की तब सरकार ने पेस्टीसाईंडस फेक्ट्री के लिए लाइसेंस देने बन्द कर दिये थे। तब उन्होंने 1980 में गुड़गावं में बंदी के कगार पर खड़ी नार्दन मिनरल्स प्राइवेट लिमिटेड खरीदी। जो उस समय देश का पहला पेस्टीसाईंडस गैमेक्सीन बनती थी। यही से कहानी की शुआत हुई। अग्रवाल ने इसमें रिश्तेदारों को पार्टनर बनाया। लोगो से उधार लिया। उसकी शेयर कैपिटल तीन लाख रुपया और उसका नुकसान पौने तीन लाख रुपया था। बैंकों ने बैलेंश शीट देखते ही कर्ज देने से माना कर दिया।

उस समय पेस्टीसाईंडस का लाइसेंस गिनी-चुनी मल्टीनेशनल कम्पनियों के पास था। कच्चा माल उन्ही के पास होता था जरुरत के हिसाब से कच्चा माल नहीं मिल पता था। आयत के लाइसेंस भी उन्ही के पास था। आग्रवाल ने कोशिशि करके 1983-84 में एक करोड़ का आयत लाइसेंस लिया। इससे कच्चे माल की दिक्कत दूर हुई और सप्लाई भी बढ़ी। 1985 में कम्पनी का पब्लिक इश्यू आया। इससे कम्पनी की हैसियत बढ़ी और निर्यात भी शुरू कर दिया।

1992 में डीयूपोंट कम्पनी से अग्रवाल ने करार किया इस करार के बाद कम्पनी की कहानी बदली इनका नया प्रोडक्ट डीयूनेट बाज़ार में आया। जो इल्ली मारने में खासा कारगर साबित हुआ। यह थोड़ा बिषैला था। इसके लिए कम्पनी मास्क भी देती हैं। यह प्रोडक्ट कम्पनी का ब्राण्ड बन गया। इसको लोग लाइन में लगकर खरीदते थे। कही-कही तो पुलिश के निगरानी में लोग लाइन में लगकर खरीदते थे। चार साल में 10 लाख लीटर केमिकल बिक गया।

2001 में अग्रवाल ने कुछ अमेरकी कम्पनियों से तकनीकी सहयोग का समझोता किया। भारत में एक प्रोडक्ट पंजीकृत करने में 10 करोड़ और पांच से सात साल लग जाते हैं।

गुड़गावं में फक्ट्री के मुख्यालय में एक रॉयल एनफील्ड बुलेट अकसर लोगो को अपनी और ध्यान खिचती हैं। यह वही मोटरसाईकिल हैं जो अग्रवाल ने 1958 में खरीदी थी। इसे वहा निशानी के तौर पर रखा गया हैं। उस समय परिवहन के साधन कम थे। इसी मोटरसाईकिल से अग्रवाल गावं-गावं जाया करते थे।

31 मार्च 17 तक धनुका का पेस्टीसाईंडस का कारोबार 800 करोड़ तक पहुँच गया हैं। अग्रवाल कहते हैं की आज भी किसानो को पेस्टीसाईंडस के बाड़े में जानकारी पूरी नहीं हैं। जबकि यह उनके पैदवार बढ़ाने में कारगर हैं। देश में अनाज की पैदवार बढ़ाने की सख्त जरुरत हैं।

अग्रवाल कम्पनी की इमेज से जुदा एक दिलचस्प बात सुनते हैं। जब अमीर खान के टी वी कार्यकर्म सत्यमेव जयते में पेस्टीसाईंडस के उत्पादकों को खलनायक के तौर पर दिखया गया। तो मेरी पोती ने मुझसे कहा की आप ऐसा क्यों कर रहे है। पेस्टीसाईंडस की गलत छवि बनाई जा रही हैं। तब मैंने अमिताभ बच्च्चन को अपनी कम्पनी का ब्राण्ड एम्बेसडर बनाया।

आज कम्पनी के हर मंडी में धनुका के डीलर हैं। फिल्ड में मौजूद 1500 कर्मचारी उसके नए प्रोडक्ट को किसानो तक ले जाते हैं। और उसके इस्तमाल की ट्रेनिंग भी देते है। अग्रवाल का दावा है की वह किसानो का पैदवार को दुगना करने के अपने लक्ष्य पर काम कर रहे हैं। अभी कम्पनी ने धान के साथ उगने वाला मोथा नाम का खर पतवार को नष्ट करने के लिए सेंप्रा नाम का नया प्रोडक्ट बाज़ार में उतरा हैं।

धनुका का मार्केट कैप 3,500 करोड़ रुपया का हैं। आज कम्पनी बीएसई और एनएसई में लिस्टेड हैं। धनुका टॉप -500 कम्पनियों में शामिल हैं।

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